TB ke lakshan

Tuberculosis: टीबी के लक्षण, कारण और इसका देसी इलाज | TB ke lakshan or Ayurvedic Upchaar

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Tuberculosis: टीबी के लक्षण, कारण और इसका देसी इलाज TB ke lakshan or Ayurvedic Upchaar

टीबी को राजयक्ष्मा के नाम से भी जाना जाता है। जैसे कुष्ठरोग त्रिदोषज तथा संक्रामक व्याधि है, उसी तरह राजयक्ष्मा भी त्रिदोषज गंभीर तथा संक्रामक रोग है। WHO की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी मरीज भारत में हैं। भारत के बाद इंडोनेशिया और चीन का नम्बर आता है।

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टीबी (क्षय) किसे कहते हैं?

वाग्भट्ट जी ने रोगों का राजा नाम ‘राजयक्ष्मा’ माना है। इस रोग में शरीर की रस-रक्त आदि धातुओं का शोषण हो जाता है, इसलिए इसे ‘शोष’ कहा जाता है। इस रोग के होने से शरीर की बाहरी और आंतरिक क्रियाओं का अधिक क्षय हो जाता है, जिससे इसे क्षय भी कहा जाता है।

टीबी होने के कारण

आधुनिक वैज्ञानिक दण्डाणु विशेष (बैसिलस ट्यूबरकुलोसिस) को राजयक्ष्मा का उत्पादक कारण मानते हैं, जो अमाशय को छोड़कर शरीर के किसी भी भाग में राजयक्ष्मा रोग की उत्पत्ति कर सकता है। इस रोग के सहयोगी कारण भी होते हैं जैसे –

वंशपरम्परा यह रोग कुछ वंशों में पूर्वजों से संतानों में संक्रान्त हो जाता है।
युवावस्था यह रोग युवकों में भी पाया जाता है।
व्यवसाय धुआं उगलने वाले कारखानों, आता-चक्की, खराद की मशीन, आरा-मशीन, रुई धुनने की मशीन आदि स्थानों में काम करने वालों को यह रोग अधिकतर होता है।
घनी बस्ती अस्वच्छ, गंदे, सूर्य प्रकाशरहित, भीड़ भरे स्थानों में रहने वाले अधिकांश व्यक्ति इस रोग से आक्रांत हो जाते हैं।
गरीबी या धनाभाव शरीर के उपयुक्त पोषक तत्वों से युक्त आहार न मिलने से, स्निग्धता के आभाव में शरीर इस रोग से आक्रांत हो जाता है।
अतिश्रम जो व्यक्ति अपनी शारीरिक क्षमता की अवहेलना कर अधिक श्रम करते हैं, उनमें साहसजन्य क्षय रोग होता है।
जीर्ण रोग ज्यादा दिनों तक किसी रोग के होने पर शरीर निर्बल हो जाता है, जिससे खांसी, श्वास, मधुमेह या बुखार दीर्घकाल तक रहने से राजयक्ष्मा भी हो जाता है।

टीबी के प्रकार और लक्षण (TB ke lakshan)

आइये अब जानते हैं चरक संहिता के अनुसार टीबी के प्रकार और उनके लक्षण

1. साहसिक यक्ष्मा

युद्ध करना (अपनी शक्ति से अधिक शक्तिशाली के साथ लड़ना), बहुत पढ़ना, ज्यादा बोझ उठाना, अधिक पैदल चलना, अधिक उपवास करना या अधिक ऊँचाई से कूदना, अधिक तैरना या ऐसा कोई कार्य करना जो अपनी शक्ति से अधिक शक्ति की अपेक्षा रखता हो और इससे छाती के क्षतिग्रस्त हो जाने से प्रकुपित वायु कफ तथा पित्त को प्रेरित कर शरीर के विभिन्न भागों में दौड़ने लगती है।

साहसिक यक्ष्मा के लक्षण
  • इसमें रोगी बोल नहीं पाता, कठिनाई से धीमी आवाज़ में साँय-साँय बोल पाता है।
  • कंठ के विकृत होने से लगातार खांसी आने लगती है।
  • खांसते खांसते फुफ्फुस के फट जाने से रक्त का वमन होने लगता है।
  • दुर्बलता आने लगती है।
  • शौच भी ढीला आने लगता है।
2. संधारण यक्ष्मा

सन्धारण का मतलब है – मल-मूत्र के वेगों को रोकना। जब मनुष्य अपने साथियों के साथ, गुरु के चरणों में या स्त्रियों के बीच बैठा हो तो भयवश, लज्जावश या घृणा से आये हुए अपानवायु (पाद), मल या मूत्र के वेगों को रोकता, तब उन वेगों को रोकने से वायु कुपित हो जाता है। वह कुपित वायु पित्त और कफ को उभाड़ कर ऊपर-नीचे और तिरछे शरीर में फैल जाता है।

सन्धारण यक्ष्मा के लक्षण
  • सिर में अधिक पीड़ा होती है।
  • मल पतला हो जाता है या बिल्कुल सूख जाता है।
  • दोनों पसलियों में बहुत पीड़ा होती है।
  • कंधों में जोरों से दबाने जैसी पीड़ा होती है।
  • खांसी, बुखार जैसे रोगों को उत्पन्न करता है।
3. धातुक्षयजन्य राजयक्ष्मा

ईर्ष्या करना (दूसरों को अपने से सम्पन्न देखकर कुढ़ना), किन्हीं वस्तुओं को पाने की लालसा, भयभीत होना, मन में पीड़ा होना, क्रोढ करना, शोक करना; इन कारणों से तथा शरीर के दुबला-पतला होने, अत्यधिक स्त्री-प्रसंग करने से और उपवास करने से शुक्र तथा ओज, ये दोनों क्षीण हो जाते हैं।

धातुक्षयजन्य राजयक्ष्मा के लक्षण
  • अधिक बुखार होना
  • हड्डियों में दर्द होना
  • डायरिया होना
  • दोनों पसलियों में पीड़ा होना
  • भोजन करने की इच्छा न होना
4. विषमाशजन्य राजयक्ष्मा

जब कोई व्यक्ति परस्पर विरुद्ध गुण वाले अनेक प्रकार के आहार को आहार-विधि-विधान के विपरीत प्रकार से ग्रहण करता है तो उस व्यक्ति के वातादि दोष विषम होकर अतिकष्टप्रद अनेक रोगों को उत्पन्न करते हैं।

विषमाशजन्य राजयक्ष्मा के लक्षण
  • मुख से पानी आते रहना
  • छर्दि रोग (नाक से स्त्राव, गले की खराश, बुखार आदि)
  • सिर में तेज दर्द होना
  • शरीर के अंदर जलन उत्पन्न होने लगती है
  • शरीर कमजोर होने लगता है

टीबी होने से पहले के लक्षण (या उसका पूर्वरूप)

  1. बार-बार छींक आना
  2. मुख से पानी छूटना
  3. मुख मीठा रहना
  4. भोजन करते समय थकान मालूम होना
  5. खाते समय जी मचलाना
  6. बीच-बीच कभी उल्टी हो जाना
  7. बार-बार हाथों को देखना
  8. आँखों में सफेदी होना
  9. स्त्रीप्रसंग की अतिशय इच्छा

टीबी का आयुर्वेदिक उपचार – चरक संहिता

चरक संहिता में टीबी का पूरा उपचार बताया गया है। आइये जानते हैं किन औषधियों के माध्यम से हम टीबी को जड़ से खत्म कर सकते हैं –

खजूर और मुनक्का

खजूर और मुनक्का को पीसकर उसमें पीपर का चूर्ण, चीनी, मधु तथा घी मिलाकर चटनी बना लें। इसके सेवन से खांसी, बुखार, श्वास चढ़ना नष्ट होते हैं।

दालचीनी और छोटी इलाइची

मिश्री, वंशलोचन, छोटी इलाइची और दालचीनी – इन सभी में से दालचीनी की मात्रा को दोगुना रखें और सबको पीसकर चूर्ण बना लें और शहद तथा घी मिलाकर चाटना चाहिए।

वासाघृत और शतावरीघृत

राजयक्ष्मा के रोगी को जब हाथ, पैर और अंगों में जलन हो, बुखार हो या खून निकले तो वासाघृत अथवा शतावरीघृत का प्रयोग करना बहुत हितकर होता है।

दाल का पानी

टीबी के रोगी को बकरी का दूध, मूंग और मोठ की दाल का पानी सेवन कराना चाहिए। यह बुखार और खांसी को दूर करता है और स्वर को उत्तम बनाता है।

सोंठ और इन्द्रजौ

सोंठ और इन्द्रजौ के चूर्ण को चावल के धोवन(वह पानी जिससे कोई चीज धूलि गई हो) के साथ पिलायें और जब चूर्ण पच जाए तो तिनपतिया(तीन पट्टी वाली वनस्पति औषधि), मट्ठा और खट्टे अनार का रस डालकर पकाई गयी यवागु (जिसमें कुछ yeast आ गया हो) खिलानी चाहिए।

पुराना अन्न

टीबी के रोगियों के आहार के लिए एक साल पुराने अन्न को अच्छी प्रकार सुसंस्कृत रुचिकर ढंग से पकाकर खिलाएं। जो अन्न पचने में सहायक, वीर्य वर्धक, स्वादिष्ट, सुगन्धित और खाने में प्रसन्नताजनक होते हैं वे उत्तम कोटि के पथ्य होते हैं।

रक्तचंदन का लेप

सौंफ, मुलहठी, कूठ, तगर और रक्तचंदन – इन सबको बारीक पीसकर घी मिलाकर थोड़ा गर्म कर सिर, पसलियों के दर्द को नष्ट करने के लिए लेप लगाएं।

निष्कर्ष

ऊपर दी गयी सभी आयुर्वेदिक औषधियों का उपयोग किसी अच्छे आयुर्वेदिक चिकित्सक की देख-रेख में ही करें। वैसे तो ये सभी उपचार चरक संहिता में से बताये गए हैं परन्तु देश, काल और मनुष्य की शरीर की शक्ति के अनुसार ही आयुर्वेदिक चिकित्सक इन्हें देता है।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न- टीबी में आहार क्या लेना चाहिए?

जौ, गेहूँ की रोटी या अगहनी चावल का भात, मूली और कुल्थी के अच्छी प्रकार से रुचिकर बनाये हुए यूष (दाल का पानी) के साथ जो अनुकूल पड़े उसका सेवन करें।

प्रश्न- टीबी का दुबारा होने का कितना खतरा रहता है?

यदि टीबी की दवाइयों का सेवन बीच में छोड़ दिया जाए तो बैक्टीरिया दुबारा पनपने लगते हैं और इलाज मुश्किल हो जाता है। एक अध्ययन में पाया गया है कि 10% पुरुषों को ही सफल इलाज के बाद दुबारा टीबी का खतरा होता है।

प्रश्न- टीबी में खांसने पर कैसी बलगम निकलती है?

जब रोगी खांसता है तो वह चिपचिपा, गाढ़ा, आमगन्धी, हरा, श्वेतयुक्त पीले रंग का द्रव रस के साथ-साथ थूकता रहता है।

प्रश्न- टीबी का इलाज कितने दिन चलता है?

यदि आप एलोपैथिक दवाइयों का सेवन करते हैं तो इसमें लगभग 12 महीने का समय लगता है और बहुत अधिक गंभीर स्थिति होने पर 2 साल का समय भी लग सकता है। आयुर्वेद में ऐसा कोई मापदंड नहीं है कि कितना समय लगेगा, ये तो कोई अच्छा आयुर्वेदिक चिकित्सक रोगी की दशा देखकर ही बता सकता है।

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